27 अक्टूबर 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
माफ करना महाकाल, आप भोले हैं लेकिन सब ने आपको पत्थर मान लिया है ...
15 दिन मंदिर में प्रवेश बंद। ये सजा है महाकाल के आंगन में उनके सामने, उनके भक्तों के सामने अभद्र और अश्लील गालियां देने की। बस 15 दिन। मान लिया गया है कि इतने में पाप धुल जाएंगे, सब फिर निष्पाप हो जाएंगे। एक पुजारी और साधु। दोनों ही महाकाल के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं और उन्हीं के सामने मर्यादाएं भी तार-तार कर रहे हैं। और सजा मात्र 15 दिन मंदिर में प्रवेश बंद। हो सकता है पाप करने वालों ने और सजा देने वालों ने, सब ने ही ये सोच लिया होगा कि महाकाल तो भोले हैं उनको गालियों का अर्थ क्या पता या फिर ये समझ लिया होगा कि पत्थर का शिवलिंग ही तो है। कहां देख सुन सकता है। लेकिन, महाकाल सब देख रहे हैं।
आश्चर्य ये नहीं है कि एक पुजारी और एक साधु महाकाल के सामने उनके आंगन में ही मर्यादा भूल गए। ना उन्हें अपनी गरिमा का ध्यान रहा ना महाकाल की महिमा का। आश्चर्य तो ये है कि ये सब देखने के बाद किसी का खून नहीं खौला। ना प्रशासन के उन अधिकारियों का जो सारी व्यवस्थाएं तय करते हैं, ना उन नेताओं का जो महाकाल की सवारी में ही डमरू और मंजीरे पीट-पीटकर अपनी राजनीति चमकाते हैं, ना उन पुजारियों का जो महाकाल के नाम पर ही अपना घर-परिवार पाल रहे हैं, ना उस साधु समाज का जो शैव कहलाने पर गर्व करता है और ना ही उन भक्तों का जो रोज महाकाल को शीश नवाने आते हैं अपनी जीवन नैया तारने के लिए। किसी का खून नहीं खौला।
क्यों नही साधु समाज ने उस साधु की जटाओं का वो फेटा हमेशा के लिए उससे छीन लिया, जिसके लिए उसने महाकाल के सामने गालियां दे दीं उन्हीं के पुजारी को। क्यों पुजारी समाज ने उस पुजारी पर आजीवन प्रतिबंध की मांग नहीं उठाई, जिसने भगवान के सामने ही एक साधु को अभद्र बातें कहीं। क्यों उज्जैन से भोपाल तक किसी भी नेता ने ये मांग नहीं उठाई कि मंदिर के गर्भगृह में सबका प्रवेश बंद कर दिया जाए। साधु हो या पुजारी, या फिर देश या प्रदेश के अतिविशिष्टगण। क्यों किसी भक्त ने ये आवाज नहीं उठाई कि कब तक वीआईपी कल्चर को ढोया जाएगा, भक्त और भगवान दोनों को शर्मिंदा किया जाएगा।
विधायक का बेटा हो, पुलिसवाला हो, पुजारी हो या कोई साधु। हर कोई आकर महाकाल के सामने मर्यादाएं भंग करते हैं। शासन-प्रशासन भंग-तरंग में छोटी-मोटी दिखावटी कार्यवाही करके बैठ जाता है। आज तक किसी एक मामले में भी कोई ऐसा ठोस कदम नहीं उठाया गया कि वो मिसाल बने। महाकाल ने एक और मौका दिया था, वो भी चूक गए।
सवाल ये भी है कि जब महाकाल के सामने सब एक हैं, तो व्यवस्थाएं कई सारी क्यों हैं? गर्भगृह में जब प्रवेश वर्जित है, तो सभी के लिए हो, क्या कोई साधु, नेता या अधिकारी महाकाल से बड़ा है जो उसे गर्भगृह में प्रवेश मिल जाएगा। एक तस्वीर दिखा दीजिए, जिसमें गुजरात के सोमनाथ या दक्षिण के रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग में गर्भगृह में कोई वीआईपी पूजा कर रहा हो। व्यवस्थाएं समान कर दीजिए, ये रोज के झगड़े खत्म हो जाएंगे। आम लोगों के लिए मंदिर में मोबाइल ले जाना वर्जित है, लेकिन पुजारी, अधिकारी और आमजनता शान से मंदिर में सेल्फी लेते दिखते हैं। पुजारियों के सोशल मीडिया अकाउंट महाकाल के साथ उनके फोटो-वीडियो से भरे पड़े हैं। सब अपनी दुकानें चमका रहे हैं लेकिन शासन-प्रशासन को दिख नहीं रहा।
भस्मारती में भगवान को भस्म चढ़ते देखना महिलाओं के लिए वर्जित है। लेकिन, खुद महाकाल मंदिर प्रशासन रोज सोशल मीडिया पर भस्मारती के वीडियो चला रहा है और दुनिया देख रही है। मर्यादाएं सभी जगह तोड़ी जा रही है। कोई देखने वाला नहीं है। प्रशासन जागता तब है जब ज्योतिर्लिंग के सामने ही इस तरह अभद्रताएं हो जाती हैं। आप सब मनमानी करते रहिए, लेकिन ये समझ लीजिए कि महाकाल भोले हैं, पत्थर नहीं। वो सब देख रहे हैं। हम भी अपनी आदत के अनुसार चुपचाप सब देख रहे हैं।
कटप्पा का सपना...
अपने कटप्पा जी याद होंगे? कभी बाबा की नगरी में एडीएम पद पर विराजमान थे। वर्तमान में बाबा पशुपतिनाथ की नगरी में पदस्थ है। ग्रामीण विकास में सेवा दे रहे है। जब बाबा की नगरी में थे। तो उनको कटप्पा नाम दिया था। उस नाम को वह पशुपतिनाथ की नगरी में साबित कर रहे है। उनका मन ग्रामीण विकास में नही लग रहा है। कटप्पा जी को हमेशा राजस्व विभाग के काम में मजा आता है। तभी तो पशुपतिनाथ की नगरी में कटप्पा जी के सपने की चर्चा खुलकर सुनाई दे रही है। वैसे हम बता दें कि कटप्पा जी को अपना सपना पूरा करने का हुनर भी आता है। बस,पूरा कब होगा? यह हमकों पता नहीं है। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
असहाय प्रशासन...
कहने को तो अपने अट्टू जी संकुल में 2 नंबर के अधिकारी है। अपने उज्जवल जी के बाद उनका ही पॉवर चलना चाहिए। न्यायिक शक्ति के मालिक है। मगर वह खुद को ही असहाय महसूस कर रहे है। कारण..एक बंगला है। जिसको तीसरे माले से आवंटित किया गया है। किंतु अपने उम्मीद जी ने नहीं। बंगला राजस्व विभाग को मिलना चाहिए। मतलब अपने अट्टू जी को। लेकिन इस पर वर्दी के कमाण्डेन्ट ने खेल कर दिया। जोड-तोड करके हासिल कर लिया। इसमे तीसरे माले के 6 फुटिये की भूमिका रही है। जिसके बाद यह बंगला अट्टू जी को आवंटित हो गया। अब मामला बंगला खाली होने पर अटक गया है। कमाण्डेन्ट ने शर्त रख दी है। मुझे कोई दूसरा बंगला दिलाओ। तब खाली करूँगा। नतीजा-अपने अट्टू जी ने किराए पर घर ले लिया है और खुद को असहाय महसूस करते हुए चुप है। तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं
बहुत कम ऐसे लोग होते है। जो अपने मातहतों को इंसान समझते है। खासकर ऊँचे पद पर पहुँचकर तो मातहत को अपना गुलाम ही समझते है। मगर कुछ अपवाद भी होते है। जो 18 घण्टे डयूटी करने वालों को अपना परिवार मानते है। जैसे अपने कप्तान जी। अलग ही मिजाज है। खुद अपने हाथ से भोजन परोसते है। जिस दिन विकास पुरूष तराना आने वाले थे। उसके एक दिन पहले दाल-बाफले की दावत दे डाली। सबको स्नेह से भोजन कराया। उसके बाद दिवाली मनाने भी अपने मातहतों को बगैर सूचना के पहुँच गए। थाने पहुँचकर जमकर आतिशबाजी की। जिससे वर्दी का मनोबल बढ गया। तभी तो हर वर्दीधारी बोल रहा है। कप्तान हो तो ऐसा। वर्दीवालों की बात में दम है। हमने भी कई कप्तान देखे, मगर इस कप्तान की बात निराली है। अपनी टीम को सहेजना, खुशी में शामिल करना, हर कोई नहीं कर पाता है। जिसके लिए कप्तान से हमेशा ऐसे ही रहना की आशा रखते हुए, हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
गेट क्यो लगवाया....
अपने वजनदार जी ने एक गेट लगवाया है। उस जगह जहाँ वह निवास करते हैं। मतलब यह कि इंदौर रोड पर। कारण..यहाँ से दिन रात निकलने वाले डंपर थे। जिसके कारण वह खुद और कालोनी निवासी परेशान थे। इससे बचने का उन्होंने अनोखा रास्ता अपनाया। सीएसआर फण्ड का उपयोग किया। मगर इससे भी उनकी परेशानी का निराकरण नहीं होने वाला था। इसके लिए उन्होंने गेट पर विकासपुरुष सहित बाकी नामों का उल्लेख कर दिया। जिसका असर भी हुआ। इस रास्ते से निकलकर मलबा ले जाने वाले जो डंपर जा रहे थे। उनको दूसरा रास्ता तलाश करना पडा। डंपर चिंतामन मार्ग पर एक होटल के नजदीक भराव करने 24 घण्टे काम कर रहे थे। अब यह दूसरी कालोनी से होकर जा रहे है। खेत से नया रस्ता निकाला गया है। जिस जगह भराव हो रहा है। उसका सौदा एक क्लब से हुआ है। जो कि अखिल भारतीय स्तर पर चर्चित है। इस क्लब के आने से बाबा की नगरी में विकास होगा। मगर वजनदार जी डंपरों से परेशान थे। तो गेट लगवा दिया। उनको अब आराम है। तो हम भी आराम से चुप हो जाते हैं।
प्रथम नागरिक बनने की इच्छा....
अपने कमलप्रेमियो के बीच चर्चा है। अपने पहलवान की इच्छा की। 20 साल तक शहर की राजनीति का केंद्र रहे पहलवान फिलहाल अज्ञातवास काट रहे है। कभी कभी नजर आ जाते है। मगर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा अभी भी बरकरार है। वह है किसी भी प्रदेश का प्रथम नागरिक बनने की। इधर अपने बदबूवाले शहर के ताऊ जी अगले साल के दूसरे महीने में कार्यकाल खत्म करने वाले है। पता नहीं राजनीति में कब और क्या हो जाए। शायद बाबा महाकाल अपने पहलवान पर मेहरबान हो जाए। ऐसा पहलवान को चाहने वाले कमलप्रेमी बोल रहे है। जिसमे हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
ऊपरी कमाई पर रोक से दु:खी...
बाबा के दरबार मे प्रोटोकॉल से दर्शन करवाने वाले दु:खी है। इसका कारण ऊपर लिखी हेडिंग से पाठकगण समझ सकते है। ये सब इन दिनों अपने फटाफट जी को कोस रहे है। जिन्होंने व्यवस्था सुधार दी। अब भक्त के पास सीधे लिंक जाती है और राशि ऑन लाइन जमा हो जाती है। बिल्कुल भस्म आरती वाली स्टाइल में। पहले ऐसा नहीं होता था। टिकिट कटवाना पडता था। जिसमे कर्मचारी गोल माल करके अपनी जेब गर्म कर लेते थे। अब अंकुश लग गया है। जिसके लिए अपने फटाफट जी बधाई के हकदार है। बाकी हमको चुप ही रहना है।
दादा पर नजरें...
कमलप्रेमी गलत अर्थ नहीं निकाले। यहाँ पर दादा से आशय पवित्र-दादा से है। जो कि पुराने आराधना प्रेमी है। अभी अभी प्रकट उत्सव मनाया गया उनका। मंगलनाथ रोड पर कार्यक्रम था। दादा अपना जलवा दिखाना चाहते थे। मतलब यह साबित करना था। वह किसी से नहीं डरते हैं। सीलिंग के मामले में भी दादा सक्रिय रहे है। उसके विरोध में। प्रकट उत्सव पर तो दादा ने अपने तेवर और इरादे जगजाहिर कर दिए हैं। जिसके बाद दादा पर नजरें जम गई है। इस उत्सव में जो कुछ भी बोला गया और इशारों में समझाया गया। उसकी पूरी रिपोर्ट ऊपर तक पहुँच गई है। जिसके बाद दबी जुबान से कमलप्रेमी बोल रहे है। जल्दी ही कुछ ऐसा होगा, जो कल्पना से परे हो सकता है। देखना यह है कि आने वाले वक्त में कल्पना से परे क्या होता है? तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
दिवाली गिफ्ट में 1 प्रतिशत...
शिवाजी भवन के गलियारों में चर्चा आम है। अपने हवासिंह के उपहार की। जो उन्होंने 6 झोन के नए नवेलो अधिकारियों को दिया है। इन सभी की नियुक्ति अभी अभी हुई है। बेचारे दिवाली को लेकर दु:खी थे। तो सभी ने मिलकर अपने गुरु हवासिंह जी से गुहार लगाई। मकसद था। दिवाली बेहतर हो जाए। इसलिए सभी ने मुलाकात की। यह सभी सीएमओ लेबल के अधिकारी है। अपने जूनियरों का दुखडा सुनकर अपने हवा जी द्रवित हो गए। नतीजा उन्होंने फोन खडखडा दिया। निर्देश दे दिए। अब से किसी भी भुगतान पर झोन के इन 6 लोगो का ध्यान रखना है। इसका सीधी भाषा में मतलब 1 प्रतिशत कमीशन सीधे इनको मिलना चाहिए। उनके आदेश का पालन भी हुआ है। ऐसा हम नहीं, बल्कि शिवाजी भवन वाले बोल रहे है। ताज्जुब की बात यह है कि अपने इलाहाबादी एंग्रीयंगमैन को इसकी भनक भी नहीं लगी है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
3 लड्डू का खेल....
मंदिर के गलियारों में चर्चा है। 3 लड्डू में से हर रोज 2 लड्डू गायब होने की। पाठकगण सोचेंगे। 2 लड्डू अगर गायब होते हैं। तो क्या फर्क पडता है। हर रोज क्विंटलो में लड्डू बनते हैं। 2 क्या 20 भी गायब हो जाए? तो कौन सा पहाड टूट जाएगा। मगर यह गायब होने वाले 2 लड्डू अगर सवा -सवा किलो के हो तो? जिसमे भरपूर मेवा-मिष्ठान्न डाले जाते है। यह लड्डू प्रतिदिन तैयार होते है। जो बाबा को भोग लगाने लाये जाते है। यहां नियम कहता है। ये 3 लड्डू वापस यूनिट जाना चाहिए। जहां बाकी के बनने वाले लड्डू में इनको मिलाना होता है। ताकि बाबा का प्रसाद विश्व प्रसिद्ध लड्डू तैयार हो सके। जब तक निर्माण यूनिट मंदिर में थी। तब तक तो यही होता था। मगर अब यह विशेष लड्डू बनकर तो रोज आते है। भोग भी लगता है। किन्तु यूनिट वापस 1 ही लड्डू जाता है। जो यूनिट में प्रतिदिन बनने लड्डू में प्रसाद के रूप में मिलाया जाता है। मगर बाकी के 2 लड्डू कौन रख लेता है? इसका किसी को कोई पता नहीं है। अगर पता है तो अपने बाबा महाकाल को। जो सब कुछ देखकर भी चुप रहते है। ऐसा मंदिर वालों का कहना है। अब इसमें कितना सच है-कितना झूठ। हमको पता नहीं। हमको तो बस अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
मेरी पसंद
मेरे बारे में जो कहते हैं बजा कहते हैं
मैं बुरा हूँ तो मुझे लोग बुरा कहते हैं
आप सच्चे है मगर ये तो बता दे हमकों
झूठ सच लगने लगे तो उसे क्या कहते हैं
नोशीन वासिफ