29 दिसम्बर 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
दाएं-बाएं ही नजर आए....
उंगलियों पर गिने जा सकने वाले ही दिन गुजरे है।जब पुलिंग एक्ट को लेकर अपने हाइनेस ने पत्र-वीडियो वायरल किया था।उसके बाद सभी कमलप्रेमियो को इंतज़ार था।अपने विकासपुरुष के नगर आगमन का।कारण आमने-सामने होने पर हाइनेस की बॉडी-लेंग्वेज क्या होगी?क्या वैसी ही-जो उनके बयान के पहले नजर आती थी या फिर कुछ अलग बदलाव नजर आएगा। अपने कमलप्रेमियो ने जैसा सोचा था।वैसा ही नजर आया।अपने हाइनेस नजर तो आए।मगर वैसे नही-जैसे पूर्व में नजर आते थे।कभी दाएं तो कभी बांए।ऐसा हम नहीं कह रहे है।यह तो अपने कमलप्रेमी दबी जुबान से बोल रहे है।किसी के बोलने पर तो हम अंकुश लगा नही सकते है और ना यह हमारा अधिकार बनता है।किंतु चुप रहने का हमारा नैतिक अधिकार है।तो उसका पालन करते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मैडम के फोन का असर
पिछले सप्ताह युवा पँजाप्रेमी प्रदेश मुखिया आए थे।उनका जोरदार स्वागत भी हुआ।पूरे कार्यक्रम की प्रभारी पँजाप्रेमी मैडम जी थी।इस बीच अपने पँजाप्रेमी पहलवान ने एक फोन लगाया।प्रदेश मुखिया के पिता को।जिन्होंने सुपुत्र को निर्देश दिए।दाल बिस्किट वाली तहसील जरूर जाना। आज्ञाकारी साहबजादे ने वादा कर लिया।फिर प्रभारी मैडम को इससे अवगत कराया।यूथ प्रभारी का अपने पहलवान से 36 आंकड़ा जगजाहिर है।उन्होंने साफ मना कर दिया।लेकिन यूथ मुखिया ने कह दिया।वह जाएंगे।उधर पहलवान ने सारी तैयारी कर ली।रात 8 बजे बाद प्रदेश यूथ पँजाप्रेमी मुखिया रवाना हुए।इंगोरिया तक ही पहुँच पाए होंगे।
प्रभारी मैडम जी ने राजधानी में जाने किसको फोन लगाया।नतीजा.. उनके पास एक फोन आया और वाहन ने तत्काल यू-टर्न ले लिया। ऐसा युवा पँजाप्रेमी बोल रहे है।सच और झूट का पता मैडम जी बता सकती है।जो हमकों तो किसी हाल में नही बताने वाली।इसलिए हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी आज ही बात हुई थी...
शहर में इन दिनों कई कमलप्रेमी-कलमकारों-चैनल वालो-और कई ऐसे लोग अक्सर यह कहते दिखते हैं।मेरी आज ही फोन पर बात हुई।कोई सुबह-कोई दोपहर-कोई शाम-तो कोई देर रात बात करने का दावा करता है।इन सभी का इशारा अपने विकासपुरुष की तरफ होता है।यह सभी दम ठोककर यह बात कहते है।जिसे सुनकर हमको आश्चर्य होता है।सूबे के मुखिया के पास इतना टाइम होता है।जो इन सभी के लिए कभी भी बात करने के उपलब्ध रहे। आश्चर्य की बात यह है कि कई तो यह भी दावा करते है कि खुद विकासपुरुष का फोन आया था।उन्होंने मुझे एक विशेष-काम बताया है।ताज्जुब की बात यह है कि ऐसा दावा करने वाले को देखकर ही अहसास होता है कि वह झूट बोल रहा है।वह भी सफेद-झूट।ऐसे में हमकों शायर वसीम बरेलवी का शेर याद आ जाता है।
वो झूट बोल रहा था बड़े सलीके से
मैं एतबार न करता तो और क्या करता।
तो हम भी एतबार करते हुए चुप हो जाते है।
SIR में चोरी....
हेडिंग पढ़कर ये पक्का है।हमारे पाठकगण इसका अर्थ गलत ही निकालेंगे।शायद अर्थ यही निकाल ले। मतदाता के नामों की चोरी हुई है।मगर उनकी सोच गलत है।यह चोरी तो सामान की हुई है।वह भी दक्षिण इलाके में।अपनी जिज्जी की देखरेख में काम चल रहा था।एसआईआर के काम मे कोरे कागज की ज्यादा जरूरत पड़ रही थी।तो जेब ढीली करके 10 पैकेट बुलवाए गए थे।इसके अलावा रबर बैंड भी।शाम होते होते 2या 3 पैकेट कोई चुपचाप उठा कर चलता बना।जब यह अपनी जिज्जी को पता चला।तो उन्होंने अपना मत्था ठोक लिया।फिर ताबड़तोड़ में एक कमरा स्कूल का लिया गया।जिसमें बाकी की स्टेशनरी रखवाई गई और ताला जड़ दिया गया।एक व्यक्ति विशेष तौर पर स्टेशनरी की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया।उसके बाद से सब ठीक हो गया।अपनी जिज्जी ने भी चैन की सांस ली।तो हम भी ऐसी चोरी पर मुस्कुराते हुए चुप हो जाते हैं।
मामा जी की कानाफूसी...
हम दावे से यह लिख सकते है।हमारे पाठकगण यही सोचेंगे?हम जगप्रसिद्ध मामा जी की बात लिखने वाले है।मगर यह बहुत कम लोगों को पता है।अपने मंदिर में भी एक मामा जी है।यह उनकी उपाधि है।जबकि उनका असली नाम गर्मी के दौरान खाए जाने वाले एक 7 प्रकार के अन्न के नाम पर है।वह सोमवार की सुबह मंदिर में मौजूद थे।उस वक्त जब कमलप्रेमियो के राष्ट्र प्रमुख औऱ विकास पुरुष पहुँचे थे।ग्रीन रूम में विकास पुरूष बैठे थे।तभी अचानक अपने मामाजी अंदर घुस गए।फिर विकास पुरुष के कान में कुछ कानाफूसी करके निकल गए।उसके बाद फिर वापस गए।फिर कुछ कान में फुसफुसा कर बाहर आ गए।अब सवाल यह है कि मंदिर वाले मामा जी ने आखिरकार क्या मंत्र फूंका होगा? मंदिर वाले और नजारा देखने वाले कयास लगा रहे है।मंदिर वाले मामा जी ने कोई सकारात्मक तो नहीं बोला होगा? अब क्या फुसफुसाहट की होगी।हम तो अंदाजा भी नहीं लगा सकते है।इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
5वी फेल का कारनामा...
हमारे पाठक अपने 5वी फेल नेताजी को पक्का भूल गए होंगे।कभी पँजाप्रेमी संस्था के मुखिया थे।चरण लाल के रबर स्टैंप।इन्होंने अपनी पँजाप्रेमी सरकार के दौरान गजब का कारनामा कर दिया था।मामला मंदिर-पुजारी-जमीन से जुड़ा है।मंदिर के व्यवस्थापक अपने उज्ज्वल जी है।मतलब मंदिर शासकीय है।तो पुजारी को भरण पोषण के लिए 15 बीघा जमीन दे रखी है।बाकी की 30 बीघा की हर साल नीलामी होती है।इस जमीन के लिए 5 वी नेताजी ने अपनी सत्ता का फायदा उठाकर पुजारी का नाम हटवा दिया।अपने भतीजे को पुजारी दर्ज करवा दिया।असली पुजारी को पता ही नहीं चला।वह आज भी मंदिर में पूजा करते है।खुलासा तब हुआ जब मानदेय को लेकर वह संकुल पहुँचे।तो पुजारी नेताजी के भतीजे निकले।बस फिर क्या था।विवाद हुआ।इस बीच विजयागंज मंडी में नेताजी और पुजारी पुत्र का आमना-सामना हो गया।नेताजी भड़क उठे।उन शब्दों का उपयोग कर लिया।जिसे हम लिख नही सकते है।फरियादी ने वर्दी को रिपोर्ट दर्ज करवा दी है।मगर जमीन की असली लड़ाई अभी बाकी है।देखना यह है कि कमलप्रेमी सरकार में पँजाप्रेमी 5वी फेल नेताजी पर कार्यवाही होती है या नहीं? यह पूरी घटना अपने पँजाप्रेमी दबी जुबान से सुना रहे है।मगर हमकों तो अपनी आदत के अनुसार बस चुप ही रहना है।
आख़री गेंद पर छक्का...
शारजाह में भारत-पाक का वह मैच पाठकों को याद होगा।जावेद ने अंतिम गेंद पर सिक्स मारा था।यही नजारा आईएएस मीट में हुए मैच में था।5-5 ओवर का मैच था।हर टीम में 5 खिलाड़ी।जिसमे एक वृद्ध-एक बच्चा-एक महिला और 2 युवा खिलाड़ी होते है।फाइनल मैच था।बड़े साहब की टीम को 25 रन बनाने थे।जीत के लिए।विरोधी टीम ने बड़े साहब को 3 रन में वापस लौटा दिया। उनकी टीम को संकट में ला दिया।लास्ट 6 गेंद में 10 रन की जरूरत थी।गेंदबाज 10 साल का बालक था। जो घबरा गया।टीम ने उसको मोटिवेट किया।नतीजा 3 गेंद पर कोई रन नहीं मिले।1 गेंद पर चौका लग गया।अगली गेंद पर कुछ नहीं मिला।अब लास्ट गेंद और 6 रन।बिलकुल शारजाह जैसा रोमांच।इधर 10 साल का गेंदबाज घबराया हुआ।उसने फुलटॉस बॉल फेक दी। तो छक्का लग गया।लेकिन इसका नियम था।गेंद अगर दीवार पर सीधी लगे तो सिक्स,अगर उसके पहले गिरे तो चौका, और दीवार के बाहर तो आउट।मगर यहां तो गेंद ही नहीं मिल रही थी।जिसकी तलाश ईमानदारी से अंपायर को अपनी निगरानी में करवानी थी।मगर ऐसा नहीं हुआ।जिससे बाद गेंद मिली,तो दर्शाया गया।दीवार से गेंद टकराई थी। अंपायर ने सिक्स दे दिया।जिससे आईएएस अधिकारियों में फुसफुसाहट शुरू हो गई।तो फैसला अपने बड़े साहब पर छोड़ा गया।बड़े साहब आखिर बड़े साहब है।उन्होंने भी चतुराई से काम लिया।अंपायर के फैसले को सही करार दिया। जिससे आईएएस अधिकारियों में इस मैच को लेकर सवाल उठ रहे है। दबी जुबान से निष्पक्षता पर संदेह किया जा रहा है।जिसमे हम क्या कर सकते है।बस जैसे आईएएस लॉबी चुप है, वैसे हम भी चुप हो जाते हैं।
विकास पुरुष की नजरें
अपने विकास पुरूष का जो असली नाम है।वह श्रीकृष्ण का पर्याय है।इसमें वह परफेक्ट उतरते है।इसके अलावा उनके योग ने उनको परिपूर्ण बना दिया है।तभी तो चंबल संभाग के मुख्यालय पर उन्होंने मंच से वह देख लिया।जिस पर किसी की नजर नहीं पड़ी थी।देश के छोटा भाई मंच पर मौजूद थे।पंडाल काफी लंबा था।पीछे तक किसी की नजर पहुँचना मुश्किल ही नहीं असंभव था।लेकिन मंच पर विकास पुरूष ,मंचासीन थे।जिनकी नजरें हर जगह रहती है।उन्होंने तत्काल देख लिया।सबसे अंतिम पंक्ति पर हलचल मच गई है और जनता उठकर जाने की तैयारी में है।बस फिर क्या था।उन्होंने चंबल संभाग के जिले की आईएएस मुखिया को फोन खनखना दिया।नतीजा।प्रशासन एक्टिव हो गया।तत्काल व्यवस्था सुधार ली गई।ऐसी चर्चा चंबल संभाग के ख़बरची वर्ग में सुनाई दे रही है।हमारे ख़बरची मित्र ने विकासपुरुष की तारीफ में यह सब बताया। जिसे सुनकर हमें तो गर्व महसूस हुआ है विकास पुरुष पर।बाकी अपने कमलप्रेमियो का हम कुछ नहीं कह सकते है।इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
छात्रों का साधुवाद--आ बैल मुझे मार
सबसे पहले अपने फटाफट जी का दिल से आभार और उन छात्रों की तरफ से साधुवाद।जिनकी परेशानी को अपना समझ कर तत्काल पानी की मोटर को सुधरवा दिया।इसके साथ ही गर्म पानी के लिए सोलर को भी दुरुस्त करवा दिया।अब शोध संस्थान के बच्चों को न केवल इस सर्दी में पानी भरने अलसुबह जाना पड़ेगा, बल्कि नहाने के लिए गर्म पानी भी मिलेगा।जबकि हमको सोलर पॉवर की कोई जानकारी नहीं थी।पिछले सप्ताह इसी कॉलम में हमने मोटर का जरूर जिक्र किया था।किंतु फटाफट जी ने दोनों पर ध्यान दिया।इसके अलावा एक नया मसला मंदिर के गलियारों में सुनाई दे रही है।जो ऊपर लिखी कहावत की तरफ इशारा कर रही है। मामला सभी मंदिर कर्मचारियों के आईडी से जुड़ा है। मगर मंदिर के अंदर कई मंदिर है। जिनके पुजारियों ने एवजी रख रखे हैं।जिनको मुख्य पुजारी वेतन देते है।उदाहरण के लिए बाबा बाल हनुमान मंदिर को लेते है। यहाँ हमेशा तो मुख्य पुजारी नहीं रहते हैं।मगर वेतनभोगी रहते है। ऐसे करीब 30 से 50 मंदिर है।जिन पर वेतनभोगी बैठे है।जिनका नियमानुसार आईडी कार्ड नहीं बनाया चाहिए। मगर अपने फटाफट जी ने भी इनकी सूची मांग ली है।अब अगर इन सभी का मंदिर कर्मचारियों का कार्ड बन गया। तो आने वाले सालों में यह सभी मंदिर कर्मचारी होने का भविष्य में दावा करने में पीछे नहीं रहने वाले।यहीं वजह है कि कहावत आ बैल मुझे की कहावत सुनाई दे रही है।जिसमें हम क्या कर सकते है।बस,अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
साढ़े सात हजारी....
अपने वजनदार जी ने बैठक बुलाई थी।उज्ज्वल जी सहित 64 विभागों के मुखिया मौजूद थे।30 पेज का एजेंडा भेजा था।64 विभागों के कार्यों की जानकारी मांगी थी।जिसमे अपने इन्दौरीलाल औऱ एंग्रीमैन जी पर विशेष मेहरबानी थी।अपने इन्दौरीलाल जी के विभाग से जो जानकारी तलब की गई थी। उसके लिए 7500 पेज तैयार करने पड़े। यह जानकारी तत्काल भेज दी गई।जिसके बाद किसी शायर का यह शेर हमकों अचानक ही याद आ गया है।जो कि एजेंडा को लेकर शायद हमारे पाठकों को पसंद आए।
तुम्हारी सोच से भी कहीं आगे है तजुर्बा मेरा
मैं हादसे देखकर नहीं, झेलकर बड़ा हुआ हूं ...
यह शेर अपने इन्दौरीलाल जी पर बिलकुल सटीक बैठ रहा है।
बाकी हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
विकासपुरुष की शुभकामनाएं...
अपने विकासपुरुष हर प्रकार के व्यसन से मुक्त है।भोजन में भी उनकी पसंद मोरधन प्राथमिकता पर है।कोरोना के दौरान से गुनगुना पानी ही पीते हैं।इसलिए जब भी कोई उनके पास किसी भी प्रकार के व्यसन मुक्ति का सुझाव लेकर पहुँचता है।तो वह उसके लिए समय निकालकर प्रमोट करते है।जैसे पिछले सप्ताह रविवार की रात को किया।जब वह अपने गृहनगर आए थे।भले 11 बज गए थे।फिर भी नशा मुक्ति का संदेश देने वाली फिल्म के कलाकारों का हौसला बढ़ाया।सभी को शुभकामनाएं दी।मगर उनके आने के पहले ग्रीन रूम का नजारा देखने वाला था। फ़िल्म से जुड़े कलाकार धूम्रपान दाण्डिका का ऐसे धड़ल्ले उपयोग कर रहे थे।जैसे चाय-पानी पी रहे हो।इसमे चित्रपट की हीरोइन भी शामिल थी।यह सब देखने वाले आश्चर्य में थे।सवाल कर रहे थे।यह कैसी नशा मुक्ति है।ऐसा हम नही अपने कमलप्रेमी बोल रहे है।मगर हमकों तो आदत के अनुसार चुप रहना है।
.....उतारा नहीं गया!
शायर मेहशर आफरीदी का बहुत खूबसूरत अशआर है।जो इन दिनों मंदिर से शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रहा है।
अशरफ हो इस जहाँ मे तो मगरूर मत रहो ।निकाला गया है तुमको उतारा नहीं गया ।
शेर तो पढ़ लिया।अब पहले अशरफ का अर्थ समझ लीजिए।इसका मतलब होता है।
सम्मानित।तो अगर प्रतिष्ठित है तो जनहित में काम करना जरूरी होता है। इसकी तुलना मंदिर और शिवाजी भवन वाले कर रहे है।
1.अपने फटाफट जी पर वाकई इन दिनों लोड है। जिसकों लेकर उनसे हमदर्दी भी है।मगर यह उनके लिए इतिहास दर्ज कराने का मौका है। किंतु उन्होंने मंदिर की हर आरती में नंदीहॉल को खाली करने का आदेश दे दिया।जबकि होना यह चाहिए था कि प्रतिष्ठित इंसान की तरह उनकों कोई बेहतर व्यवस्था करनी थी। क्योंकि उनकी ही पूरी जिम्मेदारी बनती है।ऐसा मंदिर वालों का दबी जुबान से कहना है।
2.अब शिवाजी भवन के गलियारों में चल रही चर्चा पर गौर फरमाएं।अपने सम्मानित एंग्रीमैन वो कर दिखाया। जो आजतक हमनें नहीं देखा और ना किसी से सुना। अपने फ्रीगंज की उस सब्ज़ी मंडी को खाली करवा दिया। जिसकी कभी सपने में भी कल्पना नहीं थी। उस मार्ग से गुजर के देखिए।एक अनोखा सुखद अहसास होगा। जो कि ऊपर लिखे अशआर को सही साबित कर रहा है।अब अशरफ का फैसला हम अपने पाठकगण पर छोड़ते है और अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मंदिर का पॉइंट-कारकेड गलत जगह पहुँचा...
घटना पिछले सप्ताह की है।जब कमलप्रेमियो के राष्ट्रीय प्रमुख का आगमन हुआ था।अपने विकासपुरुष भी साथ थे।वीआईपी गेस्ट हाऊस से पॉइंट चला।मंदिर जाएंगे।दोनो वीआईपी के लिए अलग -अलग कारकेड तैयार थे।तो वर्दी के सेट पर पॉइंट चल गया।इस बीच राष्ट्र प्रमुख और विकास पुरूष के बीच गाड़ी में बैठकर बात हो गई।विकासपुरुष फ़िल्म प्रमोशन में जाएंगे और प्रमुख मंदिर के लिए।जिसके बाद अपने विकास पुरुष दूसरी गाड़ी में बैठ गए।उनको पॉलिटेक्निक कालेज जाना था और प्रमुख को मंदिर।मगर सेट-पॉइंट के चलते दोनो कारकेड एक ही जगह प्रमोशन की जगह पहुँच गए। कमलप्रेमी प्रमुख का काफिला गेट पर पहुँच कर रुक गया।तब जाकर क्लियर हुआ। गलती हो गई।नजारा देखने वालों का कहना है।अपने कप्तान जी तत्काल प्रमुख के वाहन तक गए।संभवतः उन्होंने इस गलतफहमी के लिए माफी मांगी।कमलप्रेमी प्रमुख ने भी कोई बात नहीं बोलकर अपनी दरियादिली का सबूत दिया। जिसके बाद उनका काफिला यू-टर्न लेकर मंदिर की तरफ रवाना हुआ। इस पूरी घटना में माफी को लेकर असमंजस हो सकता है।मगर घटना हुई थी।यह पूरी तरह सच है।इसके अलावा कमलप्रेमी प्रमुख की एक और दरियादिली की चर्चा मंदिर से सुनाई दे रही है।अलसुबह नाश्ता उन्होंने परोसा।खुद ने भी विकासपुरुष के साथ किया। जब थाली उठाने का वक्त आया।तो उन्होंने घमंड नहीं दिखाया। प्रमुख ओर विकासपुरुष ,दोनो ने मंदिर के नियम का पालन किया।खुद अपनी प्लेट को उठाकर ,वहीं रखा,जहाँ बाकी सब खुद रखते है।ऐसा यह नजारा देखने वालों का कहना है।मगर हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है।
माताराम कहती थी...
मेरी माँ चुप रहेंगे की सबसे बड़ी आलोचक थी।हर शब्द को पढ़कर उसका अगर अनर्थ अर्थ निकल रहा तो मुझें फटकार लगाने में देर नही लगाती थी। उन्होंने ही मुझसे वादा लिया था।साल के अंत में उन सभी से माफी जरूर मांगना।जिनका नामकरण करके उनके लिए लिखते हो। कारण..किसी का अगर आपकी लेखनी से दिल आहत हुआ होगा, उसके दिल में अगर कोई कड़वाहट होगी।वह भले ही पूरी तरह मिटे नही,मगर थोड़ी कम जरूर होगी।तो माताराम के आदेश का पालन करते हुए, हम उन सभी से दिल से माफी मांगते हैं।जिनको हमारे शब्दों से चोट पहुँची है। उम्मीद है कि आप सभी यह सोचकर माफ कर देंगे कि...जैसे आप अपनी ड्यूटी करते हैं,वैसे ही हमारी यह ड्यूटी है।बाकी नया साल 2026 आप सभी के लिये मंगलमय हो,आप सभी देशहित-जनहित में अपने विकास पुरूष जैसे कीर्तिमान रचे।यही चुप की तरफ से शुभकामनाएं। बाकी आदत के अनुसार चुप होने से पहले विदा लेते हुए साल 2025 का मेरी पसंद का यह अशआर हमेशा याद रखे।
हर कदम इक आग है चलना संभलकर कह गया।
जनवरी के कान में घायल दिसंबर कह गया।
है ना ज्यादा हारने से जीतना कुछ भी यहाँ
यह सच्चाई कब्र में लेटा सिकंदर कह गया
जहीर अब्बास