05 मई 2025 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

05 मई 2025 (हम चुप रहेंगे)

लाठी का बिल ...

वर्दीवालो को कभी परेशान या घबराते हुए देखा है? कैसी भी विपरीत परिस्थितियां हो। घेराव- पथराव- दंगा। वर्दी पहनने वाला कभी परेशान नहीं होता है। उल्टे वह हर परिस्थिति में दिन-रात- 24 घंटे- ठंड-धूप-बरसात में खड़ा रहता है। इसीलिए वर्दी को हमेशा सेल्यूट करने का हमारा मन होता है। किन्तु इन दिनों वर्दीधारी घबराये और परेशान नजर आ रहे है। इसके पीछे कारण मिलने वाले बिल है। जो कि हर महीने किसी ना किसी वर्दी वाले को थमा दिये जाते है। इन बिलो का भुगतान करना वर्दी की मजबूरी है। कारण... बिल देने लाठी जी खुद आते है। लाठी जी, वर्दी वालो में उच्च दर्जा रखते है। उनको मना करने की हिम्मत कोई नहीं रखता है। बल्कि अपने लाठी जी का नाम सुनकर वर्दीधारी घबरा तक जाते है। ऐसी चर्चा वर्दी वालो में थ्री स्टार से लेकर निम्न स्तर तक सुनाई दे रही है। किन्तु कोई भी यह खुलकर बताने को तैयार नहीं है। आखिर लाठी जी कौन है। इस सवाल पर वर्दीधारी चुप्पी साध लेते है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

बुद्धि भ्रष्ट...

अपने कमलप्रेमी इन दिनों बुद्धि भ्रष्ट-बुद्धि भ्रष्ट की दबी जुबान से चर्चा कर रहे है। इशारा भस्मार्ती अनुमति और संगठन के एक पदाधिकारी की तरफ है। जिनको यह जवाबदारी मिली हुई थी। वर्षो से यह काम कर रहे थे। कमलप्रेमियों को अनुमति दिलवाना। मगर पिछले दिनों वह धरा गये। किसी की अनुमति बनवाने के नाम पर 7 हजारी लिए थे। भक्तगण गुजरात से आये थे। जिनके शहर के एक खबरची से दोस्ताना संबंध थे। भस्मार्ती के बाद उन्होंने खबरची से बात करी। तब मामला उजागर हुआ। खबरची ने पहले तो दाडीवाले प्रवक्ता और फिर दालवाले नेताजी को इस लेन-देन की जानकारी दी। अपने दालवाले नेताजी ने सबसे पहले रकम वापस करवाई। इसके बाद अनुमति बनवाने के काम से बुद्धि-भ्रष्ट को हटा दिया। यह वही पदाधिकारी है। जिन्होंने यह काम करते-करते चौपहिया वाहन से लेकर होटल तक बना लिया है। ऐसा हमारा नहीं, बल्कि अपने कमलप्रेमियों का कहना है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

गायब ...

संकुल के गलियारों में चर्चा है। तीसरा माला गायब हो गया है। कल तक दूसरे व तीसरे माले के बीच शीतयुद्ध चलता रहता था। एक-दूसरे के काम में  टांग अडाना सामान्य बात थी। किन्तु जैसे ही अपने उम्मीद जी ने मेलाधिकारी का और जिले में नये मुखिया का आगमन हुआ। तीसरे माले का आस्तित्व ही खत्म हो गया है।। तीसरे माले के मुखिया ने भी खुद को विलोपित कर लिया है। अब नाम केवल उम्मीद जी का ही सुनाई दे रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों में उम्मीद जी के आने से खुशी की लहर है। तो हम भी इन सभी की खुशी में शामिल होते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

श्रीगणेश ...

आखिरकार जिले के नये मुखिया (नामकरण के लिए इंतजार करे) ने श्रीगणेश कर ही दिया। वह भी उस काम का । जिसका पिछले 9 माह से सभी अधिकारियों को इंतजार था। इशारा अपनी चटक मैडम जी और उनके विभाग की तरफ है। जिनके कामों की कभी भी समीक्षा नहीं हुई। उल्टे साप्ताहिक बैठक में अपनी मैडम जी, दूसरे विभागों के कामों की समीक्षा कर लेती थी। तत्कालीन जिले के मुखिया की कुर्सी पर विराजमान हो जाती थी। लेकिन नये मुखिया ने आते ही अपने तेवर दिखा दिये। मैडम जी के विभाग की समीक्षा कर डाली। जनपद अधिकारी की लू उतार दी। कामों की प्रगति पर नाराजगी दिखाई। इस दौरान अपनी चटक मैडम जी के चेहरे को देखकर वहां मौजूद सभी अधिकारी मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। जिसमें हम क्या कर सकते है। हम तो बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।

XL

शीर्षक पढ़कर यह अंदाजा नहीं लगाये। हमारा इशारा कपड़ों की साईज की तरफ है। हम तो XL शीट की बात कर रहे है। जो नये मुखिया के आगमन से पहले हर बैठक में खुलती थी। इसी XL शीट से विभागों की समीक्षा होती थी। निशाने पर सबसे ज्यादा एक कार्यपालन यंत्री रहते थे। जो हर बैठक में 2-2 घंटे तक हर सवाल का जवाब देते थे। मगर जिले के नये मुखिया के आते ही XL शीट बंद हो गई है। लंबी-लंबी घंटो चलने वाली बैठकों का दौर अब इतिहास बन चुका है। जिससे प्रशासनिक अधिकारियों में,  

खासकर लोनिवि में खुशी की लहर है। देखना यह है कि यह खुशी की लहर कब तक रहती है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

प्रतिबंध ...

मंदिर में मोबाइल पर प्रतिबंध तो पहले से ही लगा हुआ था। मगर उस पर अमल नहीं हो रहा था। अब एक बार फिर मंदिर की तरफ से कोशिश हुई है। पूर्णत: प्रतिबंध की। इसका असर कितना होगा? यह तो बाबा महाकाल जाने, नये मुखिया या अपने फटाफट जी। लेकिन प्रयास सराहनीय है। जिसके लिए जितनी तारीफ की जाये, कम है। किन्तु एक सवाल मंदिर के गलियारों में सुनाई दे रहा है। क्या यह प्रतिबंध उन पॉवरधारी नेताओं पर भी लागू होगा। जो कि बाबा की देहरी पर जाकर दर्शन करते है। ताजा मामला शुक्रवार की रात का है। ना केवल देहरी से दर्शन किये, बल्कि वहीं खड़े होकर मोबाइल से फोटो भी खिचे गये। जो कि सोशल मीडिया पर भी अपलोड किये गये। ऐसे कई मामले है। तभी तो सवाल खड़ा हो रहा है। जिसका जवाब किसी के पास नहीं है। सब चुप है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

समन्वय ...

घटना करीब 15-17 दिन पुरानी है। घटनास्थल पंजाप्रेमी मुख्यालय। समन्वय को लेकर बैठक बुलाई थी। मुंबई से प्रभारी आए थे। चुनिंदा 2 दर्जन पंजाप्रेमी नेता इसमें शामिल थे। जिसमें चरणलाल जी, छोटा बटला जी, भाभी जी, दमदमा की मीठी गोली, होटल वाले भय्या, 5 वीं फेल नेताजी आदि शामिल थे। इस बैठक में जूतम-पैजार की नौबत आ गई। क्यों आ गई। तो एक-दूसरे के खिलाफ बैठक में इस्तेमाल किये गये शब्दों को पढ़ लीजिए।

1. निर्दलीय चुनाव लड लेते है, फिर पार्टी में वापस आ जाते है। 2. एक चांटे में जमीन पर गिरा दूंगा। 3. जो तुमने मेरे साथ किया-मैने भी तुम्हारे साथ वही किया। 4. किसी के बाप की बपोती नहीं है पार्टी। 5. तुम्हारे बेटे के कपड़े कहां सिलते है, सबको पता है। यह सब नजारा देखकर मुंबई से आये प्रभारी ने अपना मत्था पकड लिया। समन्वय कराने आये थे। मगर जूतम पैजार की नौबत आ गई। बेचारे कुछ कर नहीं सकते थे। तो चुपचाप बैठकर देखते रहे। ऐसा भरोसेमंद पंजाप्रेमियों का कहना है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

बांस पर बांस ...

युवा पंजाप्रेमियों का सदस्यता अभियान शुरू हो चुका है। जिस दौरान यह शुरू हुआ। अपने बिरयानी नेताजी धार्मिक यात्रा पर गये थे। राममंदिर से लेकर पशुपतिनाथ मंदिर की यात्रा थी। तो युवा पंजाप्रेमी उत्साह से अभियान में जुट गये। सभी ने अपने-अपने ख्याली पुलाव पकाने शुरू कर दिये। कारण सभी को लग रहा था। अपने हिसाब से गणित बैठाकर  अपने-अपने सदस्य बना लेंगे। जो कि मतदान के समय काम आयेंगे। तब तक बांस पर बांस फंसाने के विशेषज्ञ शहर से बाहर थे। किन्तु अब उनकी वापसी हो गई है। नतीजा पंजाप्रेमी खुलकर बोल रहे है। अब सदस्य कोई भी बना ले। कितने भी बना ले। बांस पर बांस चढना पक्का है। होगा वही जो अपने बिरयानी नेताजी चाहेंगे। पंजाप्रेमियों की बात में दम है। लेकिन हमको तो आदत के अनुसार बस चुप ही रहना है।  

60 पेटी का खेल ...

जिले की एक तहसील है। जो कि मावा उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यहां के एक माननीय ने खेल कर दिया है। 60 पेटी का खेल। 12 व्यापारियों से 5-5 पेटी ली है। दुकान बनवाने के नाम पर। ओटले भी तैयार कर दिए है। जिन पर शेड लगाकर दुकाने दी जायेंगी। खेल करने वाले परिषद से जुड़े है। जिन्होंने अपनी जेब गर्म की है। ताज्जुब इस बात का है। जमीन का मालिकाना हक मदन मोहन मंदिर का है। जिसके व्यवस्थापक जिले के मुखिया है। यह जमीन नये बस स्टेंड के लिए दी गई थी। सशर्त। जमीन का वाणिज्यिक उपयोग नहीं होगा। लेकिन माननीय ने अपने पद का फायदा उठाकर खेल कर दिया है। ऐसी चर्चा मावानगरी तहसील के कमलप्रेमियों के बीच सुनाई दे रही है। जो कि सच भी है। देखना यह है कि जिले के नये मुखिया इस खेल को फेल कर पाते है या नहीं ? तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

आभार ...

कविवर अशोक वाजपेयी ने मौत पर लिखा है। मरने वाला / कभी अकेले नहीं मरता/ उसके साथ मरते है/ हर रोज/ 2-4-10 लोग/ उसकी याद में/ तडप-तडप कर- सिसक-सिसक कर/ पूरी जिंदगी... । गत दिनों मैं ऐसी पीडा से गुजरा हूं। मेरी माताराम जी गोलोकवासी हो गई। दु:ख की इस अंतहीन पीडा में जिस-जिस ने प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से  मेरी मदद की। सांत्वना दी। उन सभी के प्रति नतमस्तक होकर आभार प्रकट करता हूं।