21 सितम्बर 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का

21 सितम्बर 2026 (हम चुप रहेंगे)

मेरा फोन कहाँ है?

कल्पना कीजिए। अगर कमलप्रेमी संगठन के मुखिया का फोन अचानक गायब हो जाए! इसका अर्थ यह नहीं कि चोरी हो गया? दरअसल रामघाट पर जब कार्यक्रम खत्म हुआ, तब मंच से नीचे उतरते ही मुखिया को फोन की याद आ गई। उन्होंने तत्काल ऊँची आवाज में कहा—“मेरा फोन कहाँ है!” इस एक सवाल ने मानो विकासपुरुष सहित वहाँ मौजूद सभी को हैरत में डाल दिया। अब उस पल की जरा कल्पना कीजिए, जब राष्ट्रीय मुखिया अपने फोन के लिए आवाज उठा रहे थे। उस एक पल के लिए सभी की सांसें थम गई थीं। तभी मंच से आवाज आई—“मेरे पास है।” यह सुनते ही सबकी अटकी सांसें तेजी से चलने लगीं। आवाज सुनकर सभी ने पलटकर देखा। सवाल का उत्तर देने वाले बदबूदार शहर के यदुवंशी पदाधिकारी ही थे, जिसके बाद माहौल में खुशी की लहर दौड़ गई। मगर कल्पना कीजिए! अगर फोन किसी ऐसे के हाथ लग जाता, तो क्या होता? अगर वह गायब हो जाता? फोन ऑफ कर देता? तो फिर क्या होता? यह सोचकर ही हम सिहर जाते हैं। बहरहाल, बाबा की कृपा से फोन यदुवंशी के हाथ लगा! जिन्होंने विकासपुरुष और संगठन की लाज बचाते हुए चार चाँद लगा दिए। जिसके लिए यदुवंशी महामंत्री की तारीफ में सेल्यूट करते हुए हम चुप हो जाते हैं।

सदावल से लाइव...

हेडिंग पढ़कर दुविधा में मत आइए। क्योंकि चुप तो कहीं नहीं आता-जाता। मगर चुप के एक शुभचिंतक ने सदावल रथ यात्रा का लाइव हमको सुनाया। राष्ट्रीय अध्यक्ष का उड़नखटोला उतर चुका था। यहाँ भी एक घटना हुई। उसे पाठकगण ठीक इसके नीचे अलग से दिए कॉलम में पढ़ेंगे। अभी सदावल लाइव पढ़कर मजा लें। रथ तैयार खड़ा था। मुख्य अतिथि का इंतज़ार था। उसके पहले रथ पर हाइनेस और प्रथमसेवक चढ़ गए। अपने कप्तान जी ने यह देखा। वह दोनों के पास गए। निवेदन किया—पहले मुख्य अतिथि विराजमान हो जाएँ। फिर आप भी शामिल हो जाना। दोनों उतर गए और सीढ़ियों के पास खड़े हो गए। जैसे ही राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सीढ़ियों पर कदम रखा, मुखिया को मदद देने की नौटंकी करते हाइनेस पीछे भी लग गए। फिर विकासपुरुष सहित सभी सवार हो गए। प्रथमसेवक नीचे ही खड़े थे। तब तक रथ को इशारा मिला। वह चल दिया। इस बीच पीछे-पीछे अपने गेरुआ वस्त्रधारी जोगी जी तेजी से आते दिखाई दिए। रथ को इशारा मिला—रुका। प्रथमसेवक ने पहले जोगी जी को चढ़ने दिया। फिर खुद चढ़े। वह अंतिम सीढ़ी पार करके रथ पर सवार होते, रथ आगे बढ़ गया। प्रथमसेवक को नागवार लगा। वह कप्तान के पास गए। बोले—“बस मेरे लिए ही जगह नहीं थी।” कप्तान ने इस नाराज़गी को समझा। उन्होंने कहा भी—“रुकवा देता हूँ।” मगर प्रथमसेवक ने देख और समझ लिया था। वहाँ मौजूद बाकी सभी की आँखों ने भी प्रथमसेवक की लाचारी देखी। इसके बाद रथ पर सवार होना ज़मीर को मारना था। नतीजा इतना विवाद खड़ा हो गया। अब दोषी कौन—निर्दोष कौन? फैसला यह लाइव पढ़कर खुद पाठकगण कर लें। कारण हमको आदत के अनुसार चुप रहना है।

बैरंग लौटना पड़ा...

जिस दिन अपने प्रथमसेवक ने धरने पर बैठने का वीडियो अपलोड किया, राजधानी तक हड़कंप मच गया। किसी को कल्पना नहीं थी कि प्रथमसेवक ऐसा कदम उठा सकते हैं। जिसके बाद “रूठा है तो मना लेंगे” की तर्ज पर काम शुरू हुआ। प्रभारी बाऊ जी, हाइनेस, इन्दौरी नेता, दीपोत्सव प्रभारी और मेट्रो गली के नेताजी को प्रथमसेवक के बंगले पर भेजा गया। इन नेताओं ने रात से मध्यरात्रि तक हर पैतरा आजमाया। खूब समझाया, मान-मनुहार की। मकसद था—नया वीडियो बनाकर अपलोड कर दो। लेकिन प्रथमसेवक टस से मस नहीं हुए। आखिरकार सब बैरंग लौटे। ऐसा कमलप्रेमियों का कहना है। मगर हमें आदत के अनुसार चुप रहना है।

नम्बर-1 पर नाराजगी...

अपने विकासपुरुष ने दीपोत्सव पर्व को लेकर राजधानी से नम्बर-1 को विशेष तौर पर भेजा था। मकसद साफ था—अगले रोज हर मीडिया में दीपोत्सव सुर्खियां बने और इस दौरान अगर कोई भी मामला सामने आए तो उसको जगह नहीं मिले। लेकिन उलट हो गया। दीपोत्सव पर्व के साथ-साथ प्रथमसेवक कांड न केवल छप गया, बल्कि विवाद इतना बड़ा हो गया कि खुद विकासपुरुष को हस्तक्षेप करना पड़ा। ऐसे में यह चर्चा भी सामने आ गई कि विकासपुरुष ने नम्बर-1 पर नाराजगी जाहिर की है। कुछ अफसर इसकी पुष्टि कर रहे हैं, तो कुछ इसको लेकर बिल्कुल चुप हैं। चुप रहने वाले अफसरों का कहना है—नम्बर-1 का काम यही था। इसलिए नाराजगी स्वाभाविक प्रक्रिया हो सकती है। इसलिए फैसला पाठकों पर छोड़कर हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

देख नहीं रहे, बात कर रहा...

अपने दालवाले नेताजी वैसे तो मिलनसार और हँसमुख हैं। मगर बोलने से पहले अगर सोचने लगें तो बकौल मरहूम शायर ताहिर फराज, जिन्होंने लिखा था—“जब कभी बोलना—वक्त पर बोलना, मुद्दतों सोचना—मुख्तसर बोलना...” पर अमल करने लगे तो बेहतर मुखिया साबित होंगे। लेकिन उनकी आदत उलट है—बोलते पहले, सोचते बाद में। इसके शिकार दीपोत्सव प्रभारी हो गए। उस वक्त जब निरीक्षण चल रहा था, तब बात चली मीडिया से बातचीत की। नदी किनारे दालवाले नेताजी खुद मीडिया को बताना चाहते थे। मगर दीपोत्सव प्रभारी इंदौरी नेताजी ने सुझाव दिया—प्रदेश संगठन के मुखिया भी आ रहे हैं। उनसे बात कर लें। शायद वह मीडिया से बात करें। दालवाले नेताजी ने तत्काल फोन लगा दिया। बात शुरू हुई। इस बीच इंदौरी नेताजी को कोई और सुझाव याद आया। उन्होंने दालवाले नेताजी को अपनी बात कही। दालवाले नेताजी भड़क गए। सबके सामने बोल दिया—“देख नहीं रहे, फोन पर बात कर रहा हूँ।” लहजा कठोर था, जिसे सुनकर इंदौरी सीनियर नेता का चेहरा लटक गया। मगर अपमान का घूंट पीकर वह चुप रहे। ऐसा नजारा देखने वालों का कहना है और हमको आदत के अनुसार चुप रहना है।

जब दीदी ने हड़काया...

दीदी हमारा दिया नाम नहीं है। अपने कमलप्रेमी स्नेह से बुलाते हैं उनको दीदी। दीदी पर संभाग की जिम्मेदारी है। वह संतुलन बनाए रखकर काम करती हैं। मतलब आम कार्यकर्ता और पदाधिकारी, दोनों समान हैं। उनको शिकायत मिली कि रामघाट के कार्यक्रम में केवल नगर पदाधिकारियों के नाम हैं। ग्रामीण संगठन के नामों को तवज्जो नहीं दी गई है। माननीय तक के नाम गायब हैं। बस फिर क्या था। दीदी ने दुर्गा का रूप धारण कर लिया। निशाने पर दालवाले नेताजी थे, जिन्होंने दुर्गा-दीदी का आक्रोश देखकर तत्काल माफी मांग ली। ऐसा अपने कमलप्रेमियों का कहना है। लेकिन हमको अपनी आदत के अनुसार चुप रहना है।

जल्दबाजी किसलिए बाऊ जी...

अपने विकासपुरुष ने अपने गृह नगर की जिम्मेदारी बाऊ जी को दी है। इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि वह इस बात का ध्यान रखें कि कभी भी विकासपुरुष से आगे निकलने की कोशिश तो दूर, मन में ख्याल तक नहीं लाएं। लेकिन सदावल हेलीपैड पर उन्होंने जो जल्दबाजी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत कर दिया, उसे देखकर कमलप्रेमियों में सवाल खड़े हो गए हैं। नजारा देखने वालों का कहना है कि जब उड़नखटोला उतरा, तब विकासपुरुष दूसरी तरफ से उतरकर सामने आए। तब तक मुखिया का तिलक लगाकर स्वागत हो चुका था और बाऊ जी ने पगड़ी-दुपट्टा पहना दिया था। जबकि उनको इंतजार करना था, क्योंकि बाबा की नगरी में तिलक के बाद पहला स्वागत का हक विकासपुरुष का था। इसमें बाऊ जी ने जल्दबाजी कर दी। इधर विकासपुरुष जब घूमकर पहुँचे, तो उनके हाथ खाली थे। उन्होंने इधर-उधर देखा। अपने उम्मीद जी गुलदस्ता लेकर खड़े थे। विकासपुरुष ने एक पल की देरी नहीं की। उम्मीद जी से बुके लेकर संगठन मुखिया का स्वागत किया। अब कमलप्रेमी सवाल कर रहे हैं—बाऊ जी को जल्दबाजी क्यों थी? इसका जवाब बाऊ जी के पास ही है, जो कि चुप है। इसलिए हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

जो होना था हो गया—अब आगे क्या करना है...

प्रथमसेवक के धरना आंदोलन रद्द करने को लेकर हर किसी ने जोर लगा लिया था। शुक्रवार की रात को कमलप्रेमी बड़े-बड़े नेता 240 मिनट में भी प्रथमसेवक को राजी नहीं कर पाए। उस काम को विकासपुरुष ने 30 मिनट में कर दिया। शुरुआत उड़नखटोले से उतरते ही कर दी। प्रथमसेवक को हर जगह साथ रखा। सम्मान दिया। फिर वीआईपी निवास पर समाज के वरिष्ठों को बुला लिया। अंदर कमरे में विकासपुरुष ने कहा—“जो होना था, वो हो गया। अब आगे क्या करना है।” सभी की एक डिमांड थी—प्रथमसेवक को प्रशासन से सम्मान नहीं मिलता, वह मिले। विकासपुरुष ने कह दिया—“मैं सबको बोल दूंगा।” बस इतने में चेतावनी खत्म, आक्रोश खत्म, चर्चा खत्म और सब कुछ शांत और चुप हो गया। तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

इसको मत दिखाना...

दीपोत्सव मंच की घटना है। विकासपुरुष मीडिया को अलग-अलग बाइट दे रहे थे। एक चैनल बात कर रहा था। तभी विकासपुरुष को किसी अव्यवस्था को देखकर गुस्सा आ गया। वह भूल गए कि चैनल पर हैं। उन्होंने पलटकर आक्रोश जताया। फिर एकदम याद आया कि कैमरा चालू था। उन्होंने मीडिया कर्मी से कहा—“यह मत दिखाना।” मीडिया ने वादा कर दिया, जो निभाया भी। मगर जिले का सरकारी भोंपू गांधारी है। न बातचीत, न समन्वय, न मुलाकात। बस चुप रहना-देखना। यही योग्यता है। जिसकी बधाई देते हुए हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा...

मरहूम शायर डॉ. बशीर बद्र का मशहूर अशआर है। रविवार को वीआईपी निवास में इस शेर के मतले की खूब चर्चा रही। उस वक्त जब विकासपुरुष ने एक सवाल कर लिया—“देवता शब्द कैसे आया? देवता क्यों बोला जाता है?” सामने उम्मीद जी, उज्ज्वल जी, फटाफट जी, एंग्रीमैन और दमदमा के 16वें तीर्थंकर मौजूद थे। कप्तान जी नहीं थे। विकासपुरुष के सवाल पर सबने एक-दूसरे की तरफ देखा। मगर कोई कुछ नहीं बोला। सब चुप रहे। तो हमारा तो काम ही है—आदत के अनुसार चुप रहना।

विकासपुरुष की क्लास....

जब-जब विकासपुरुष का आगमन होता है, तो वह सार्वजनिक कार्यक्रम में तो नजर आते हैं, लेकिन 2028 को लेकर उनकी चिंता हर किसी की नजर में नहीं आती है। वह केवल बंद कमरे में उम्मीद जी, अल्फा जी, डेल्टा जी, उज्ज्वल जी, कप्तान जी, फटाफट जी और एंग्रीमैन को ही दिखती है। तभी तो विकासपुरुष समय निकालकर क्लास लेते हैं। जैसे रविवार को ली। वह भी एक नहीं, दो दफा। पहले वीआईपी हाउस से निकलने से पहले क्लास हुई। फिर दौरा किया। वापसी में फिर क्लास रूम में सभी की हाजरी लगी। जाते-जाते विकासपुरुष 2028 के लिए प्लॉट आवंटन की प्रक्रिया पारदर्शी बनाने के निर्देश देकर गए। ऐसा हम नहीं, बल्कि बैठक में शामिल सूत्रों का कहना है। किंतु हमें अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

प्रथमसेवक गायब...

शनिवार को अपने प्रथमसेवक को विकासपुरुष ने सम्मान देकर उस मामले का पटाक्षेप कर दिया था, जिसको लेकर विवाद खड़ा हुआ था। जिसके बाद अगले दिन रविवार को सभी को उम्मीद थी कि प्रथमसेवक नजर आएंगे। मगर ऐसा नहीं हुआ। रविवार की सुबह प्रथमसेवक अचानक अज्ञात यात्रा पर निकल गए। सुबह 9 बजे उनका सरकारी वाहन बंगले से निकला और रात साढ़े आठ बजे जब यह खबर चुप द्वारा लिखी जा रही थी, तब तक उनके अज्ञात दौरे की कोई जानकारी नहीं मिली। बस इतना सामने आया है कि देवी अहिल्या नगरी की तरफ वापसी में उनका वाहन नजर आया। यह दावा हमारे इंदौरी सूत्र का है। अब प्रथमसेवक क्यों गायब थे! यह वही जाने। इसलिए हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

चलो-चलो-साथ चलो...

हेलीपेड की घटना है। रविवार दोपहर की। विकासपुरुष संभाग के एक जिले में जा रहे थे, जो पड़ोसी राज्य की सीमा से सटा है। प्रोटोकॉल के अनुसार उम्मीद जी और अल्फा जी को वहाँ मौजूद रहना चाहिए। लेकिन दीपोत्सव से लेकर शनिवार-रविवार की दोपहर तक दोनों विकासपुरुष के साथ थे। तो उम्मीद जी ने अनुरोध कर लिया—“वहाँ जाकर क्या करेंगे?” मगर विकासपुरुष को शायद कोई बात करनी होगी। इसलिए उम्मीद जी के दुबारा अनुरोध के बदले हँसते-हँसते कहा—“चलो-चलो-साथ चलो।” यह सुनते ही वहाँ मौजूद सभी अधिकारियों ने ठहाका लगाया। मजबूरी में दोनों उड़नखटोले में सवार हुए। इसके अलावा विकास भवन के मुखिया भी साथ में उड़े। ऐसा नजारा देखने वाले अधिकारियों का कहना है। बाकी हमको आदत के अनुसार चुप रहना है।

मेरी पसंद
“सामने वाले को हल्का जानकर भारी हैं आप,
आपका मेयार देखा, कितने मेयारी हैं आप।
उफ़्फ़! तलक करते नहीं जिल्ले-इलाही के सामने,
आपको दरबार की आदत है, दरबारी हैं आप।”
अब्बास कमर