30 जून 2025 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

30 जून 2025 (हम चुप रहेंगे)

फटकार, वह भी लगातार ...

घटना पिछले सप्ताह की है। जब अपने स्मार्ट निखट्टू जी को लगातार दो दफा फटकार खानी पड़ी। वह भी 15 मिनिट के अंतराल में। घटनास्थल मंदिर का प्रवेश द्वार है। जहां अपने फटाफट जी पहले पहुंचे। सावन माह शुरू होने वाला है। काम बिखरा हुआ है। यह सब देखकर अपने फटाफट जी ने जोरदार फटकार लगाई। निखट्टू जी को। बेचारे ... यस सर- यस सर बोलते रहे। इसके 15 मिनिट बाद अपने उज्जवल जी पहुंच गये। निरीक्षण करने ही गये थे। उनके हत्थे भी निखट्टू जी चढ गये। काम की घट्टिया क्वालिटी देखकर उज्जवल जी नाराज हो गये। उन्होंने गुणवत्ता को लेकर सवाल कियास्मार्ट निखट्टू ने घट्टिया काम को बेहतर बता दिया। बस फिर क्या था। उज्जवल जी ने भी तीखे शब्दों में फटकार लगाई। जिसे सुनकर निखट्टू जी आखिर क्या करते। चुप हो गये। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

जांच की चर्चा ...

मंदिर के गलियारों में चर्चा है। एक जांच की। जो कि मंदिर के एक संस्थान से जुड़ी है। जहां पर शोध होता है। इसको लेकर शिकायत हुई थी। रंगे हाथों पकडने वाले विभाग को। 16 पाइंट इस शिकायत में शामिल है। जिसमें संस्थान के मुखिया और उनके सहयोगी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये गये है। शिकायत काफी पहले हुई थी। अब जाकर जांच शुरू हुई है। फटाफट जी ने एक्शन लिया है। संस्थान के मुखिया को बुलाकर लताडा है। जिसके बाद शोध वाले भवन में बचने के लिए पिछली तारीखों के कागजात तैयार किये जा रहे है। मामला स्टोर से जुड़ा बताया जा रहा है। जहां पर गडबडी हुई है। देखना यह है कि जांच में कुछ परिणाम निकलता है या नहीं? तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

राहवीर की खोज ...

वर्दी इन दिनों एक राहवीर की तलाश में है। ऐसे राहवीर की, जिसने दुर्घटना में घायल व्यक्ति की जान बचाई हो। मतलब यह कि अगर किसी का एक्सीडेंट हो गया है। तो उसे गोल्डन ऑवर में तत्काल अस्पताल पहुंचाया हो। ताकि घायल की जान बच जाये। ऐसे व्यक्ति की खोज में वर्दी लगी हुई है। कारण ... राहवीर योजना में 25 हजार का ईनाम व प्रशंसा पत्र उस व्यक्ति को देना है। जिसने यह पुण्य कार्य किया हो। प्रदेश में यह योजना लागू है। कई जगह राहवीर मिल गये है। मगर विकासपुरूष के गृहनगर में अभी तक कोई राहवीर नहीं मिला है। इसीलिए वर्दी खोज रही है। जिसके लिए हम अग्रिम बधाई देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

जूतो का मोह ...

वैसे तो हर इंसान कई प्रकार के मोह से ग्रसित रहता है। मगर जूते का मोह उन सब पर भारी रहता है। इस मोह के चलते ही अपने दालवाले नेता जी को विकासपुरूष का काफिला छोडऩा पडा। घटना शुक्रवार की है। जब अल्पसमय के लिए विकासपुरूष आये थे। हेलीपेड पर उतरते ही उज्जवल जी से रथयात्रा को लेकर पूछा। फिर समाज की रथयात्रा में शामिल होने चल दिये। वहीं की घटना है। अपने दालवाले नेता जी ने जूते उतारे थे। मंच पर मौजूद थे। मगर जब चलने का मौका आया। तो जूते के चक्कर में विकासपुरूष का साथ छूट गया। नतीजा दालवाले नेताजी ने दौड लगाई। हाफते हुए काफिले में शामिल किसी गाडी में सवार हुए। तब कहीं जाकर दूसरी रथयात्रा में शामिल हो पाये। ऐसा हमारा नहीं, बल्कि उनके करीबी कमलप्रेमियों का कहना है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

आवाज नीची रखे ...

शेर को कभी-कभी सवा शेर भी मिल जाता है। ऐसी चर्चा दमदमा के गलियारों में सुनाई दे रही है। इशारा अपनी चटक मैडम जी की तरफ है। जो अपने मातहतों के बीच ऊंची आवाज और भाषाशैली को लेकर मशहूर है। कुछ भी बगैर सोचे-समझे बोल देना। उनकी आदत है। मगर पिछले दिनों उल्टा हो गया। मैडम जी अपने किसी मातहत पर बरस रही थी। थोडी देर मातहत ने सहन किया। फिर उसने कह दिया। मेरी भी आवाज ऊंची हो सकती है। आवाज नीची रखे। जिसके बाद मैडम जी ने उस मातहत से कुट्टी कर ली है। अब उससे बात नहीं करती है। तभी तो शेर को सवा शेर वाली कहावत सुनाई दे रही है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।

बीमारी बनाम राजाबाबू ...

शिवाजी भवन के गलियारों में चर्चा है। शिवाजी भवन की बीमारी बनाम राजाबाबू की। पाठकों को शायद यह फिल्म याद होगी। गोविंदा वाली। जिसमें हीरो कभी वकील-कभी डॉक्टर-कभी पत्रकार- कभी नेता आदि की भूमिका निभाता है। अपने एक नगरसेवक, जिनको बीमारी की उपाधि, उन्हीं के साथियों ने दी है। वह राजाबाबू की भूमिका में ही नजर आते है। कोठी जाते है तो वकील बन जाते है। मीडिया दिखे तो पत्रकार। नेतागिरी तो कर ही रहे है। प्रथमसेवक के खास माने जाते है। जैसा मौका हो वैसा रंग बदलने में माहीर है। तभी तो इनको देखकर कमलप्रेमी हो या पंजाप्रेमी। सभी बोलते है। बीमारी बनाम राजाबाबू। बात में दम है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

1 पेटी किसने ली ...

शिवाजी भवन के गलियारों में दबी जुबान से कुछ अधिकारी बोल रहे है। 1 पेटी किसने ली। भुगतान के बदले में। करीब 20 पेटी का भुगतान होना था। इसके लिए ठेकेदार ने उपयंत्री के माध्यम से सौदा किया था। 5 प्रतिशत पर सौदा तय हुआ था। किन्तु 1 पेटी लेने के बाद भी भुगतान नहीं हो पाया। ठेकेदार ने उपयंत्री को पकडा। जिसने यह कहकर अपनी जान बचाई। मेरा कमीशन मत देना। तब कहीं जाकर ठेकेदार ने उपयंत्री को छोडा। लेकिन यह उपयंत्री कौन है ? उसने किसको 1 पेटी दी थी? फिर भी भुगतान नहीं हुआ। इसको लेकर कोई भी मुंह खोलने को तैयार नहीं है। बस यही राग अलाप रहे है। एक सप्ताह रूक जाओं। सब क्लीयर हो जायेंगा। किसने 1 पेटी ली थी। तो हम भी इंतजार करते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

डॉ. साहब की क्लास ...

दमदमा की अपनी चटक मैडम सभी की क्लास लेती है। अपनी मर्जी से भाषाशैली का उपयोग करती है। यह बात जगजाहिर है। मगर पहली दफा उल्टा हुआ। चटक मैडम जी की क्लास ली गई। वह भी एक बैठक में। लेने वाले थे अपने डॉ. साहब। जो कि बदबू वाले शहर के माननीय है। डॉ. साहब की क्लास तो नियम-कायदों को लेकर ही होती है। जैसे उन्होंने बैठक प्रोटोकॉल को लेकर 1 दर्जन बिंदू मैडम जी को गिनवा दिये। जो मैडम जी ने शायद ही कभी पढ़े होंगे। गंगा मिशन को लेकर भी आपत्ति दर्ज कराई और कामों पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। वह तो भला हो अपने विकासपुरूष के नाम का। जिसका सहारा लेकर नाराज सदस्यों को मना लिया गया। वरना बैठक में सत्तापक्ष के सदस्य ही हंगामा करने की तैयारी से आये थे। यह सब बाते डॉ. साहब के करीबी और सदस्यगण बोल रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।

भाईसाहब को नहीं बोलूंगा ...

रथयात्रा में शामिल होने अपने विकासपुरूष आये थे। उनके उडनखटोले का इंतजार हो रहा था। इंतजार करने वालों में दालवाले नेताजी, हाइनेस, प्रथमसेवक, बूटी प्रेमी नगरसेवक, कमलप्रेमी प्रवक्ता व लीडर आदि थे। यहां पर कमलप्रेमी उपाध्यक्ष भी मौजूद थे। जो कि होस्टल में हुए पिस्तौल कांड को लेकर परेशान थे। उन्होंने हाइनेस से मदद की गुहार लगाई थी। हाइनेस ने दालवाले नेताजी को बताया। विकासपुरूष तक बात पहुंचाने को। मगर अपने दालवाले नेताजी ने पलटकर कहाइतनी सी बात के लिए भाई साहब को नहीं बोलूंगा। कप्तान जी को बता देना। तो उनको बोला गया। कप्तान जी को बता दिया है। ऐसी चर्चा कमलप्रेमियों के बीच सुनाई दे रही है। यह वही मामला है। जिसको लेकर चक्रम के कर्मचारी मैदान में उतर गये है। अब देखना यह है कि होस्टल के पिस्तौल कांड का समापन कैसे होता है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

एम्बुलेंस अटकी ...

रथयात्रा में शामिल होने विकासपुरूष आये थे। उन्होंने उतरते ही पूछा था। पहले किधर चलना है। तय हुआ कि छत्रीचौक चलना है। काफिला चल पडा। इस बीच यात्रा गोपाल मंदिर पहुंच गई। काफिले में पीछे एम्बुलेंस रहती है। आपातकाल के लिए। विकासपुरूष यात्रा में शामिल हुए। वहां से निकलकर काफिला अकादमी पहुंच गया। किन्तु एम्बुलेंस सहित कुछ वाहन भीड के चलते अटक गये जिसको लेकर यातायात प्रबंधन पर सवाल उठ रहे है। उठाने वाले भी वर्दीधारी ही है। देखना यह है कि अगली बार ऐसी अव्यवस्था नहीं हो। इसको अपने कप्तान जी कैसे सुधारते है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

छापे की गुहार ...  

मंदिर से गुहार लगाई जा रही है। अपने उज्जवल जी से। गुहार यह है कि मंदिर में एफओसी (मुफ्त दर्शन) और भस्मार्ती में चोरी-चोरी घुसाने का धंधा फिर पनप रहा है। सैयां भये कोतवाल ... ही इसको बढावा दे रहे है। क्योंकि हर रोज ऊपरी कमाई होती है। जिसको पकडने की गुहार उज्जवल जी से लगाई जा रही है। फैसला उनको लेना है। पकडना है या छोडना। हमको तो बस आदत के अनुसार चुप ही रहना है।